कैसे हो शनि की पीड़ा से बचाव ?

शनि की दशा आने पर जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। शनि प्रायः किसी को क्षति नहीं पहुंचाता लेकिन मतिभ्रम की स्थिति अवश्य पैदा करता है। ऐसी स्थिति में शनि शांति के उपाय रामबाण का कार्य करते हैं। शनि से प्राप्त कष्टों से बचाव की विस्तृत जानकारी के लिए पढ़िए यह आलेख… ज्यातिष शास्त्र में शनि को शनैश्चर कहा गया है। यह सबसे धीमी गति से चलने वाला ग्रह है। यह बड़ा है इसलिए यह एक राशि का भ्रमण करने में ढाई वर्ष तथा 12 राशियों का भ्रमण करने में लगभग 30 वर्ष का समय लगाता है। यह जैसा दिखता है, वैसा नहीं है। इसे एक उदासीन, निराशावादी, ढीठ और जिद्दी ग्रह भी माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अष्टम स्थान में शनि अकाल मृत्यु का कारक है। पुत्र जन्म का भारी उत्सव मनाने के बाद लंकापति रावण ने जब अपने पुत्र की जन्मकुंडली का निरीक्षण किया, तो चलित में शनि की अष्टम भाव स्थिति और चंद्र व गुरु की उच्¬चस्थ युति टूटने के कारण रावण को बड़ा क्रोध आया और उसने शनि को उलटा लटका दिया। कुछ विद्वानों का कथन है कि रावण ने शनि की उसी दायीं टांग को पकड़कर इतने जोर से पटकनी दी कि शनि लंगड़ा हो गया, जिससे उसकी चाल धीमी हो गई और उसी दिन से उसका नाम शनैश्चर पड़ा। किंतु यह बात उचित प्रतीत नहीं होती। वास्तव में रावण एक अत्यंत ही उच्च कोटि का तांत्रिक, साधक, ज्योतिषी और विद्वान था। उसने अपनी उच्चतम कोटि की साधनाओं एवं क्रिया योग के बल पर शनि की गति को अत्यंत मंद कर दिया था, इसीलिए शनि की गति अत्यंत मंद है। शनि का नाम सुनते ही लोगों में भय की एक लहर सी दौड़ जाती है। किंतु शनि सदैव अशुभ फल ही देगा यह आवश्यक नहीं। वह जीवन में शुभ फल, लाभ, स्थिरता, आध्यात्मिक प्रगति भी देता है। वह मोक्षकारक भी है।

साढ़े साती का प्रभाव (Effects of Shani Sade Sati)

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यह सही है कि साढ़े साती के समय व्यक्ति को कठिनाईयों एवं परेशानियों का सामना करना होता है परंतु इसमें घबराने वाली बात नहीं हैं। इसमे कठिनाई और मुश्किल हालत जरूर आते हैं परंतु इस दौरान व्यक्ति को कामयाबी भी मिलती है। बहुत से व्यक्ति साढ़े साती के प्रभाव से सफलता की उंचाईयों पर पहुंच जाते हैं। साढ़े साती व्यक्ति को कर्मशील बनाता है और उसे कर्म की ओर ले जाता है। हठी, अभिमानी और कठोर व्यक्तियों से यह काफी मेहनत करवाता है।

साढ़े साती के तीन चरण (Three steps of Shani Sade Sati)

साढ़े साती का पहला चरण (First step of Shani Sadhe Sati) नज़दीकी रिश्तेदारों और जातक को प्रभावित करता है.

साढ़े साती का दूसरा चरण (Second step of Shani Sadhe Sati) चरण व्यापार और गृहस्थी को प्रभावित करता है।

साढ़े साती का तीसरा चरण (Third step of Shani Sadhe Sati) चरण बच्चों, परिवार, स्वास्थ्य को प्रभावित करता है इस चरण में मृत्यु तुल्य कष्ट की अनुभूति होती है.शनि के पाया के फल (What to Expect From Saturn’s Paya)

किसी भी व्यक्ति की जन्म राशि से शनि जिस भी भाव में गोचर कर रहा होता है. उसके अनुसार शनि के पाया अर्थात पाद फल विचार किया जाता है. व्यक्ति के जन्म कुण्डली को आधार बनाकर शनि पाया के फलों का अध्ययन किया जाता है. निम्न रुप से जन्म राशि के अनुसार शनि पाया की शुभता या अशुभता का निर्धारण किया जाता है.

जब शनि गोचर में किसी व्यक्ति की जन्म राशि से 1, 6, 11 भाव में भ्रमण करते है. तो शनि के पाद स्वर्ण के माने जाते है. या फिर जन्म राशि से 2, 5, 9 वें भाव में गोचर करते है. तो रजत पाया व शनि का गोचर जन्म राशि से 3, 7, 10 वें भाव में होने पर ताम्रपाद कहलाते है. इसके अतिरिक्त शनि का जन्म राशि से 4, 8, 12 वें भाव में गोचर होना लोहे के पाद कहलाते है.

शनि पाया अवधि में मिलने वाले सामान्य फल

1. सोने का पाया की अवधि के फल (Result of Saturn’s Gold Paya)

सोने का पाया की अवधि में व्यक्ति को कई प्रकार के सुख मिलने की संभावनाएं बनती है. धन व समृ्द्धि के लिये भी यह समय व्यक्ति के अनुकुल होता है.

2. चांदी का पाया की अवधि के फल (Result of Saturn’s Silver Paya)

यह अवधि में शुभ फल देने वाली कही गई है. शनि गोचर की इस अवधि में व्यक्ति को सब प्रकार की भौतिक सुख-सुविधाएं मिल सकती है.

3. तांबे का पाया की अवधि के फल (Result of Saturn’s Bronze Paya)

शनि गोचर की यह अवधि व्यक्ति को मिले- जुले फल देती है. जीवन के कई क्षेत्रों में व्यक्ति को सफलता प्राप्त होती है. तो कुछ अन्य क्षेत्रों में उसे असफलता का भी सामना करना पड सकता है.

4. लोहे का पाया की अवधि के फल (Result of Saturn’s Iron Paya)

शनि गोचर की यह अवधि व्यक्ति के धन में हानि हो सकती है. व्यवसाय के लिये भी यह समय अनुकुल न रहने की संभावनाएं बनती है. शनि गोचर कि यह अवधि व्यक्ति के स्वास्थ्य में कमी कर सकती है.

हर शनिवार शनि मंत्र का जप करें।

मंत्र- ‘ॐ शं शनैश्चराय नम:’। इस मंत्र का जप कम से कम 108 बार करना चाहिए।

निलान्जमं समाभासं रविपुत्रम यमाग्रजम | छाया मार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्र्वरम || 108 बार जपें।

शनि दोष निवारण यंत्र को घर पर रखें और रोज़ उसकी पूजा करे ।

14 मुखी रूद्राक्ष पहने ।

धतूरे की जड़ क प्रयोग भी कर सकते है ।#WhatsApp +91-7827020780 to connect with #Astrologersiddharthagoell